Wednesday, 17 October 2018

क्यों सऊदी अरब पश्चिमी ताक़तों के लिए ज़रूरी है

अगर ये साबित होता है कि पत्रकार जमाल ख़ाशोज्जी की हत्या में सऊदी अरब का हाथ है तो अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने उसे कड़ी सज़ा भुगतने की धमकी दी है.
बीते दो अक्टूबर को तुर्की स्थित अंकारा में सऊदी के वाणिज्य दूतावास में ख़ाशोज्जी गए थे और उनके बाद ज़िंदा बाहर आने के कोई सबूत नहीं मिले हैं.
तुर्की का कहना है कि ख़ाशोज्जी की सऊदी के एजेंटों ने हत्या कर दी. दूसरी तरफ़ सऊदी अरब ने तुर्की के अधिकारियों के दावों को झूठ कह कर ख़ारिज कर दिया है.
सऊदी ने भी पश्चिमी ताक़तों की ओर से प्रतिबंध की आशंका को देखते हुए पलटवार करने की धमकी दी है. हालांकि एक हक़ीक़त ये भी है कि सऊदी अरब पर सख़्त कार्रवाई करना इतना आसान भी नहीं है, क्या है इसकी वजहें-
पेट्रोलियम निर्यात करने वाले देशों (ओपेक) के संगठन के अनुसार, सऊदी अरब के पास विश्व के तेल भंडारों का लगभग 18 फ़ीसदी हिस्सा है और ये दुनिया का सबसे बड़ा तेल निर्यातक देश है.
इस वजह से सऊदी की विश्व में ताक़त और प्रभाव है.
उदाहरण के लिए, अमेरिका या अन्य देश अगर सऊदी पर प्रतिबंध लगाते हैं तो सऊदी सरकार तेल उत्पादन कम कर सकती है. इसकी वजह से विश्व में तेल का दाम बढ़ जाएगा जब तक दूसरे निर्यातक देश इस कमी को पूरा नहीं कर पाते.
रविवार को प्रकाशित एक संपादकीय में, सऊदी सरकार के अल अरबिया टीवी के महाप्रबंधक तुर्कि अल्दखिल ने कहा कि सऊदी पर प्रतिबंध लगाने से एक ऐसी आर्थिक आपदा आएगी जो पूरी दुनिया को प्रभावित करेगी.
"अगर तेल की क़ीमत 80 डॉलर पहुंचने पर राष्ट्रपति ट्रंप इतने नाराज़ हो गए तो किसी को इस आशंका से इनकार नहीं होना चाहिए कि क़ीमत 100 डॉलर या 200 डॉलर या इससे दोगुनी भी हो सकती है."
सऊदी अगर पेट्रोलियम उत्पादों के दाम बढ़ाता है तो ये उपभोक्ताओं पर भारी पड़ेगी और पेट्रोल पंप पर क़ीमतें बढ़ेंगी. टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (सिप्री) के अनुसार, सऊदी अरब के पास 2017 में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा रक्षा बजट था.
उस वर्ष देश ने अमेरिका के साथ 110 अरब डॉलर के हथियार सौदे पर हस्ताक्षर किए. साथ ही 10 सालों में 350 अरब डॉलर ख़र्च करने का विकल्प भी था.
व्हाइट हाउस के मुताबिक ये सौदा अमरीका के इतिहास में सबसे बड़ा था.
सऊदी अरब को हथियारों बेचने वाले अन्य देशों में ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी शामिल हैं.
अल्दखिल के संपादकीय से पता चलता है कि किसी भी प्रतिबंध के ख़िलाफ़ सऊदी अपनी सैन्य जरूरतों को पूरा करने के लिए चीन और रूस का रूख़ कर सकता है. श्चिमी ताक़तवर देशों ने ज़ोर देकर कहा है कि सऊदी अरब मध्य पूर्व में सुरक्षा बनाए रखने और चरमपंथ और आतंकवाद का मुकाबला करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.
ब्रिटेन की प्रधानमंत्री टेरिज़ा मे ने सऊदी अरब के साथ घनिष्ठ संबंध बनाए रखते हुए उसका बचाव किया है. बावजूद इसके कि यमन में सऊदी पर युद्ध अपराधों का आरोप लगाया जा रहा है, उन्होंने कहा कि "सऊदी ने ब्रिटेन की सड़कों पर लोगों को सुरक्षित रखने में मदद की है."
इस्लाम का जन्मस्थान सऊदी अरब, इस्लामी राज्य (आईएस) समूह से जूझ रहे अमेरिकी नेतृत्व वाले वैश्विक गठबंधन का सदस्य है और पिछले साल 40 अन्य इस्लामी राज्यों के साथ मिलकर इसने आतंकवाद के ख़िलाफ़ इस्लामी मिलिट्री काउंटर गठबंधन बनाया था.
अल्दखिल का अनुमान है कि ख़शोज्जी मामले में सऊदी पर कोई प्रतिबंध लगते हैं तो सऊदी और अमरीका समेत बाकी पश्चिमी देशों के बीच भरोसेमंद जानकारी साझा करना अतीत की बात हो जाएगी. रान के प्रभाव का मुक़ाबला करने के लिए सऊदी अरब ने अमेरिका के साथ मिलकर काम किया है.
ये दोनों सुन्नी और शिया मुस्लिम देश दशकों से मध्य पूर्व में परोक्ष रूप से संघर्ष कर रहे हैं.
सीरिया में सऊदी अरब ने राष्ट्रपति बशर अल-असद को उखाड़ फेंकने की कोशिश कर रहे विद्रोही गुटों का समर्थन किया है, जबकि ईरान ने रूस के साथ-साथ युद्ध के ज्वार को अपने पक्ष में बदलने में मदद की है.
अपने संपादकीय में अल्दखिल ने चेतावनी दी कि अमेरिकी प्रतिबंधों और नए हथियार सौदों के परिणामस्वरूप सऊदी अरब और ईरान के बीच बेहतर संबंध और सुलह भी हो सकती है.

Thursday, 4 October 2018

रोहिग्या शरणार्थियों को वापस भेजने पर रोक से सुप्रीम कोर्ट ने किया इनकार

सुप्रीम कोर्ट ने महज कुछ घंटों बाद मणिपुर से रोहिंग्या शरणार्थियों को वापस म्यांमार भेजे पर रोक लगाने से गुरुवार को साफ इनकार कर दिया। भारत की तरफ से आधिकारिक तौर पर म्यांमार प्रत्यर्पण का यह पहला मामला है।
वकील प्रशांत भूषण ने इस में सुप्रीम कोर्ट से दखल देने की मांग की थी और कहा था कि यह अदालत का कर्तव्य है कि वह राज्य विहीन रोहिंग्या शरणार्थियों की रक्षा करे।
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने प्रशांत भूषण से कहा कि उन्हें इस बात को याद दिलाने की कोई आवश्यता नहीं है कि जजों की क्या जिम्मेदारियां हैं। गृह मंत्रालय ने हलफनामा दायर कर कहा था कि सात रोहिंग्या अपनी सजा पूरी करने के बाद वापस म्यांमार जाने को तैयार हैं। अवैध प्रवासी थे और उन्हें फॉरनर्स एक्ट में दोषी पाया गया था।
सरकार की तरफ से पेश हुए सीनियर कानूनी अधिकारी तुषार मेहता ने कोर्ट से बताया कि म्यांमार सरकार ने इस बात को माना है कि वे उनके नागरिक हैं और उनको पहचान के लिए सार्टिफिकेट दिए हैं ताकि उनकी वापसी हो सके।
प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति एस के कौल तथा न्यायमूर्ति के एम जोसेफ की पीठ ने यह आदेश दिया। 
गौरतलब है कि न्यायालय में बुधवार को एक याचिका दाखिल कर केंद्र को असम के सिलचर में हिरासत केंद्र में बंद सात रोहिंग्याओं को म्यामां भेजने से रोकने का अनुरोध किया गया था। गृह मंत्रालय के एक अधिकारी ने बुधवार को कहा था कि रोहिंग्या प्रवासियों को गुरुवार को मणिपुर में मोरे सीमा चौकी पर म्यामां अधिकारियों को सौंपा जाएगा। 
सात रोहिंग्याओं के प्रस्तावित निर्वासन को रोकने के लिए तत्काल कदम उठाने के अनुरोध वाली यह अंतरिम याचिका पहले से ही लंबित जनहित याचिका में दाखिल की गई।
दो रोहिंग्या प्रवासी मोहम्मद सलीमुल्लाह और मोहम्मद शाकिर ने पहले जनहित याचिका दायर की थी। उन्होंने रोहिंग्या समुदाय के खिलाफ बड़े पैमाने पर भेदभाव और हिंसा के कारण म्यामां से भागकर भारत आने वाले 40,000 शरणार्थियों को उनके देश भेजने के केंद्र के फैसले को चुनौती दी थी।
असम के हिरासत शिविर में करीब 32 रोहिंग्या शरणार्थी है। इनमें से नाबालिग समेत करीब 15 रोंहिग्या शरणार्थी तेजपुर में हैं। ऐसा माना जा रहा है कि इनमें से ज्यादातर म्यांमार के रखाइन राज्य के हैं जिन्हें साल 2014 में रेलवे पुलिस ने पकड़ा था।
भारत में करीब 40 हजार रोहिंग्या
पिछले कई वर्षों से हजारों की संख्या में म्यांमार के पश्चिमी तटवर्ती इलाके रखाइन में रहनेवाले रोहिंग्या मुसलमान पुलिस और कट्टरपंथी रोहिंग्या के बीच छिड़ी खूनी लड़ाई के चलते वहां से भागने के मजबूर हुए। ज्यादातर ये रोहिंग्या शरणार्थी बांग्लादेश गए लेकिन उनमें कुछ सीमा पार कर भारत आ गए। भारतीय सुरक्षा प्रतिष्ठान ऐसा मानते हैं कि भारत में ऐसे शरणार्थियों की संख्या करीब 40 हजार है।
सुप्रीम कोर्ट ने महज कुछ घंटों बाद मणिपुर से रोहिंग्या शरणार्थियों को वापस म्यांमार भेजे पर रोक लगाने से गुरुवार को साफ इनकार कर दिया। भारत की तरफ से आधिकारिक तौर पर म्यांमार प्रत्यर्पण का यह पहला मामला है।
वकील प्रशांत भूषण ने इस में सुप्रीम कोर्ट से दखल देने की मांग की थी और कहा था कि यह अदालत का कर्तव्य है कि वह राज्य विहीन रोहिंग्या शरणार्थियों की रक्षा करे।
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने प्रशांत भूषण से कहा कि उन्हें इस बात को याद दिलाने की कोई आवश्यता नहीं है कि जजों की क्या जिम्मेदारियां हैं। गृह मंत्रालय ने हलफनामा दायर कर कहा था कि सात रोहिंग्या अपनी सजा पूरी करने के बाद वापस म्यांमार जाने को तैयार हैं। अवैध प्रवासी थे और उन्हें फॉरनर्स एक्ट में दोषी पाया गया था।